May 13, 2009

विक्रम और बेताल


कुछ कहते हैं लोग
जब सपने टूट जाते हैं
कि इस रात की सुबह होगी
सपनों की कोई और रात होगी
पर सपने भी जिंदा होते हैं
मरने पे लहू रोते हैं
लाशों सी लद जाते हैं
कन्धों पर बस जाते हैं
पर कदम तो बढ़ाना होता है
ख़ुद को थोड़ा बहलाना होता है
कि कहाँ कोई अपना था
जो दिखा वो बस सपना था


1 comment:

Anonymous said...

sapno ke apne pal..