September 17, 2009

ragging


काली चादर से ढक उसे
रात भर धुनते हैं तारे
तभी सूरज लाल आंखों से
सुबह दुखते पाँव पसारे
पिटाई की सोच ही वो
इतना घबरा जाता है
शाम होती नही कि उसका
रंग फ़िर धूमिल हो जाता है

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